श्री बजरंग बाण पाठ हिंदी में – सम्पूर्ण बजरंग बाण, पाठ विधि, धार्मिक लाभ एवं महत्त्व
सनातन धर्म में श्री बजरंग बाण को भगवान हनुमान जी की अत्यंत प्रभावशाली और भक्तिपूर्ण स्तुति माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बजरंग बाण का श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करने से जीवन के दुखों, भय, संकटों और बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है। भगवान श्रीराम के परम भक्त पवनपुत्र हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है, जो अपने भक्तों को कठिन परिस्थितियों में साहस, शक्ति और आत्मविश्वास प्रदान करने वाले माने जाते हैं।
बजरंग बाण का पाठ विशेष रूप से मनोकामनाओं की पूर्ति, मानसिक शांति, पारिवारिक सुख-समृद्धि और जीवन की परेशानियों से राहत पाने की कामना से किया जाता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन, पूर्ण श्रद्धा और नियमितता के साथ बजरंग बाण का पाठ करता है, उसे हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह पाठ भक्तों को नकारात्मक विचारों से दूर रहने और जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है।
बजरंग बाण का पाठ कब और कैसे शुरू करें?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, मंगलवार और शनिवार को बजरंग बाण का पाठ शुरू करना विशेष शुभ माना जाता है। भक्त सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान हनुमान जी के चित्र या मूर्ति के सामने दीपक जलाकर श्रीराम का स्मरण करें। इसके बाद शांत मन और एकाग्रचित्त होकर बजरंग बाण का पाठ करें।
अपनी श्रद्धा, स्वास्थ्य और सामर्थ्य के अनुसार मंगलवार या शनिवार को व्रत भी रखा जा सकता है। शनिवार के दिन कुछ भक्त हनुमान जी के साथ शनिदेव की भी आराधना करते हैं। हालांकि, व्रत रखना अनिवार्य नहीं है। भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा, सदाचार और नियमित उपासना को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
बजरंग बाण के नियमित पाठ से होने वाले धार्मिक लाभ:
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बजरंग बाण का नियमित पाठ करने से भक्तों को भय, चिंता और मानसिक अशांति से राहत मिलने की आशा रहती है। यह पाठ कठिन परिस्थितियों में धैर्य, आत्मबल और सकारात्मक सोच बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
भक्तजन बजरंग बाण का पाठ पारिवारिक कलह दूर होने, आर्थिक परेशानियों से उबरने, कार्यों में सफलता, सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना के लिए भी करते हैं। हालांकि, केवल पाठ करने से सभी समस्याएं दूर होने या धन प्राप्ति की निश्चित गारंटी नहीं होती। आध्यात्मिक साधना के साथ अच्छे कर्म, विवेक और निरंतर प्रयास भी आवश्यक हैं।
श्री बजरंग बाण का वास्तविक आध्यात्मिक महत्त्व भगवान हनुमान जी के प्रति अटूट विश्वास, निस्वार्थ भक्ति और समर्पण की भावना में निहित है। जो भक्त श्रद्धापूर्वक बजरंगबली का स्मरण करता है, वह उनके साहस, सेवा, विनम्रता और श्रीराम भक्ति जैसे आदर्श गुणों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा प्राप्त कर सकता है।
॥ श्री राम जय राम जय जय राम ॥
॥ ॐ श्री हनुमते नमः ॥
॥ जय श्री राम । जय बजरंगबली ॥
|| बजरंग बाण ||
दोहा
चौपाई
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥
बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥
दोहा
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