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Sri-Bagala-Keelaka-Stotra/श्रीबगलामुखी कीलक स्तोत्रम्

श्रीबगलामुखी कीलक स्तोत्रम् | रूप, जय, यश और सर्व बाधा निवारण का अचूक पाठ

श्रीबगलामुखी कीलक स्तोत्रम्: शक्ति और सौभाग्य का अचूक मार्ग...

श्रीबगलामुखी कीलक स्तोत्रम् एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावी स्तोत्र है। "कीलक" का अर्थ है सभी बाधाओं और शत्रुओं पर नियंत्रण रखने वाला बीज मंत्र। इस स्तोत्र के नियमित पाठ का उद्देश्य माँ भगवती से प्रार्थना करना है कि वह हमारे जीवन के मोक्ष, सुख, समृद्धि और सफलता के मार्ग में लगी सभी बाधाओं को हर दें और साधक को सुरक्षा, शक्ति और सिद्धि प्रदान करें।

यह स्तोत्र केवल पूजा का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में साधक को उन्नति और पूर्णता प्रदान करने वाला एक शक्तिशाली बीज मंत्र समूह है। जो व्यक्ति इसे श्रद्धा और नियमितता से पढ़ता है, उसे संकटों से सुरक्षा, शत्रु-दमन और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

॥ श्रीबगलामुखी कीलक स्तोत्रम् ॥

॥ स्तोत्र पाठ ॥

१. ह्रीं ह्लीं ह्लींकार-वाणे, रिपु-दल-दलने, घोर-गम्भीर-नादे!
ज्रीं ह्रीं ह्रींकार-रुपे, मुनि-गण-नमिते, सिद्धिदे, शुभ्र-देहे!
भ्रों भ्रों भ्रोंकार-नादे, निखिल-रिपु-घटा-त्रोटने, लग्न-चित्ते!
मातर्मातर्नमस्ते सकल-भय-हरे! नौमि पीताम्बरे! त्वाम्॥१॥

२. क्रौं क्रौं क्रौमीश-रुपे, अरि-कुल-हनने, देह-कीले, कपाले!
हस्रौं हस्रौं-सवरुपे, सम-रस-निरते, दिव्य-रुपे, स्वरुपे!
ज्रौं ज्रौं ज्रौं जात-रुपे, जहि जहि दुरितं जम्भ-रुपे, प्रभावे!
कालि, कंकाल-रुपे, अरि-जन-दलने देहि सिद्धिं परां मे॥२॥

३. हस्रां हस्रीं च हस्रैं, त्रिभुवन-विदिते, चण्ड-मार्तण्ड-चण्डे!
ऐं क्लीं सौं कौल-विधे, सतत-शम-परे! नौमि पीत-स्वरुपे!
द्रौं द्रौं द्रौं दुष्ट-चित्ताऽऽदलन-परिणते, बाहु-युग्म-त्वदीये!
ब्रह्मास्त्रे, ब्रह्म-रुपे, रिपु-दल-हनने, ख्यात-दिव्य-प्रभावे॥३॥

४. ठं ठं ठंकार-वेशे, ज्वलन-प्रतिकृति-ज्वाला-माला-स्वरुपे!
धां धां धां धारयन्तीं रिपु-कुल-रसनां मुद्गरं वज्र-पाशम्।
डां डां डां डाकिन्याद्यैर्डिमक-डिम-डिमं डमरुं वादयन्तीम्॥४॥

५. मातर्मातर्नमस्ते प्रबल-खल-जनं पीडयन्तीं भजामि।
वाणीं सिद्धि-करे! सभा-विशद-मध्ये वेद-शास्त्रार्थदे!
मातः श्रीबगले, परात्पर-तरे! वादे विवादे जयम्।
देहि त्वं शरणागतोऽस्मि विमले, देवि प्रचण्डोद्धृते!
मांगल्यं वसुधासु देहि सततं सर्व-स्वरुपे, शिवे!॥५॥

६. फलश्रुति:
निखिल-मुनि-निषेव्यं, स्तम्भनं सर्व-शत्रोः।
शम-परमिहं नित्यं, ज्ञानिनां हार्द-रुपम्।
अहरहर-निशायां, यः पठेद् देवि! कीलम्।
स भवति परमेशि! वादिनामग्र-गण्यः॥६॥

स्तोत्र का सारांश एवं लाभ:

  • यह स्तोत्र **श्रीबगलामुखी देवी** की स्तुति करता है और उन्हें विभिन्न बीजाक्षरों (ह्लीं, ज्रीं, क्रौं, हस्रौं, भ्रों, ऐं, क्लीं सौं) से पुकारता है।
  • **शत्रु-दलन एवं विजय:** देवी की प्रार्थना से शत्रु और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
  • **संकट और भय निवारण:** जो व्यक्ति इसका नियमित पाठ करता है, वह भय और संकटों से मुक्त रहता है।
  • **सिद्धि एवं सफलता:** वाणी, ज्ञान, शक्ति, और वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है।
  • **फलश्रुति:** पाठ करने वाला वादियों में सबसे आगे होता है और सभी प्रकार की बाधाओं से सुरक्षित रहता है।
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