शंकराचार्य-विरचित शिव-मानस-पूजा...
शंकराचार्य-विरचित शिव-मानस-पूजा भगवान शिव की एक अत्यंत प्रसिद्ध और भावपूर्ण स्तुति है, जिसकी रचना आदि गुरु आदि शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र केवल पूजा का वर्णन नहीं करता, बल्कि भक्ति, ध्यान और अद्वैत वेदांत का गहन दर्शन प्रस्तुत करता है।
आज के युग में, जब हर व्यक्ति व्यस्त जीवन जी रहा है और विस्तृत विधि-विधान से पूजा करना संभव नहीं होता, तब शिव-मानस-पूजा हमें सिखाती है कि सच्ची पूजा बाहरी सामग्री से नहीं, बल्कि शुद्ध भावना और एकाग्र मन से होती है।
शिव-मानस-पूजा क्या है?
“मानस पूजा” का अर्थ है — मन में की गई पूजा। इस स्तोत्र में भक्त अपने हृदय में भगवान शिव के लिए रत्नों का आसन, हिमजल से स्नान, दिव्य वस्त्र, चंदन, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करता है।
यह स्तुति हमें बताती है कि यदि हमारे पास भौतिक साधन न भी हों, तो भी हम पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं।
शंकराचार्य-विरचित शिव-मानस-पूजा
नाना-रत्न-विभूषितं मृगमदामोदांकितं चन्दनम् ।
जाती-चम्पक-बिल्व-पत्र-रचितं पुष्पं च धूपं तथा,
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्-कल्पितं गृहाणम् ॥
भक्ष्यं पंचविधं पयो-दधि-युतं रम्भाफलं पानकम् ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूर-खण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ॥
वीणा-भेरी-मृदंग-काहलकला गीतं च नृत्यं तथा ।
साष्टाङ्ग प्रणति: स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजा गृहाण प्रभो ॥
पूजा ते विषयोपभोग-रचना निद्रा समाधि-स्थिति: ।
संचार: पदयो: प्रदक्षिण-विधि: स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥
श्रवण-नयनजं वा मानसं वापराधम् ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्-क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥
शिव-मानस-पूजा कब करें?
- प्रतिदिन प्रातःकाल
- रात्रि ध्यान के समय
- सोमवार
- प्रदोष व्रत
- महाशिवरात्रि
- सावन मास
हालाँकि यह स्तोत्र किसी भी समय श्रद्धा से किया जा सकता है।
शिव-मानस-पूजा करने की सरल विधि:
- शांत स्थान पर बैठें।
- आँखें बंद करके भगवान शिव का ध्यान करें।
- प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझते हुए पाठ करें।
- अंत में क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता:
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में विस्तृत पूजन सामग्री और समय निकालना कठिन होता जा रहा है। ऐसे समय में शिव-मानस-पूजा हमें सिखाती है कि:
- मन ही सबसे बड़ा मंदिर है
- भाव ही सबसे बड़ा प्रसाद है
- समर्पण ही सबसे बड़ा साधन है
यदि हमारा मन पवित्र है, तो बिना किसी बाहरी सामग्री के भी पूजा पूर्ण मानी जाती है।
जीवन को शिवमय बनाने का संदेश:
शिव-मानस-पूजा का मुख्य संदेश है — “जो कुछ भी मैं करता हूँ, वह सब आपकी आराधना है।” जब व्यक्ति हर कार्य को ईश्वर को समर्पित कर देता है, तब जीवन में शांति, संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति स्वतः प्राप्त होती है।
शंकराचार्य-विरचित शिव-मानस-पूजा केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक आध्यात्मिक पद्धति है। यह सिखाती है कि सच्ची पूजा बाहरी वस्तुओं से नहीं, बल्कि शुद्ध हृदय और समर्पित मन से होती है।
हर श्वास, हर विचार और हर कर्म यदि शिव को समर्पित हो जाए, तो सम्पूर्ण जीवन ही पूजा बन सकता है।

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