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श्री गणपति अथर्वशीर्ष | पाठ, अर्थ, लाभ और विधि

श्री गणपति अथर्वशीर्ष...

श्री गणपति अथर्वशीर्ष के साथ-साथ गणेश चालीसा और गणेश स्तुति का नियमित पाठ करने से भक्त को विशेष आध्यात्मिक और सांसारिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह त्रिविध पाठ भगवान गणेश की कृपा को शीघ्र प्राप्त करने का उत्तम साधन माना गया है।
नियमपूर्वक श्रद्धा से पाठ करने पर भक्त की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा उसके जीवन से रोग, भय, दोष, शोक और मानसिक डर दूर हो जाते हैं। इससे मन को शांति, स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
साथ ही गणेश जी की पूजा करने से आयु, यश, बल, बुद्धि और ज्ञान में निरंतर वृद्धि होती है। जीवन के हर क्षेत्र में सफलता, सुख-समृद्धि और मंगल की प्राप्ति होती है।

卐 श्री गणपति अथर्वशीर्ष 卐

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम्॥

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि॥१॥
अव त्वं मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात्।
अवोत्तरात्। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समन्तात्॥२॥
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः।
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।
त्वं सच्चिदानन्दाऽद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥३॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः।
त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥४॥
त्वं गुणत्रयातीतः। त्वमवस्थात्रयातीतः।
त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मकः॥५॥
त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निर्वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्मभूः स्वरोमिति॥६॥
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरं।
अनुस्वारः परतरः। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपम्।
गकारः पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरुत्तररूपं।
नादः संधानं। सग्ंहिता संधिः।
सैषा गणेशविद्या। गणक ऋषिः।
निचृद्गायत्रीच्छन्दः। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नमः॥७॥
एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥८॥
एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैरबिभ्राणं मूषकध्वजम्॥
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्॥
भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥९॥
नमो व्रातपतये नमो गणपतये।
नमः प्रथमपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदन्ताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नमः॥१०॥

॥ इति श्री गणपति अथर्वशीर्ष समाप्त ॥


श्री गणपति अथर्वशीर्ष (अर्थ सहित):

मूल मंत्र

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम्॥

अर्थ: हे गणपति! आपको नमस्कार है। आप ही साक्षात परम सत्य हैं। आप ही सृष्टि के कर्ता, धर्ता और संहारकर्ता हैं। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आप ही हैं और आप ही नित्य आत्मस्वरूप हैं।

सत्य प्रतिज्ञा

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि॥

अर्थ: मैं सत्य और धर्मयुक्त वाणी का उच्चारण करता हूँ।

रक्षा प्रार्थना

अव त्वं मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात्।
अवोत्तरात्। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समन्तात्॥

अर्थ: हे गणपति! मेरी, बोलने वाले की, सुनने वाले की, देने वाले की और धारण करने वाले की रक्षा करें। पीछे, आगे, ऊपर, नीचे, उत्तर-दक्षिण — हर दिशा से मेरी रक्षा करें।

स्वरूप वर्णन

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः।
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।
त्वं सच्चिदानन्दाऽद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥

अर्थ: आप वाणीमय, ज्ञानमय, आनंदमय और ब्रह्मस्वरूप हैं। आप अद्वितीय सत्य-चेतना-आनंद स्वरूप हैं। आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं।

सृष्टि का आधार

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः।
त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥

अर्थ: यह सारा संसार आपसे उत्पन्न होता है, आपसे ही चलता है और अंत में आपमें ही विलीन हो जाता है। आप ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं तथा वाणी के चार स्तर भी आप ही हैं।

गुणातीत स्वरूप

त्वं गुणत्रयातीतः। त्वमवस्थात्रयातीतः।
त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मकः॥

अर्थ: आप तीनों गुणों से परे, तीन अवस्थाओं से परे, तीन देहों से परे और तीनों कालों से परे हैं। आप मूलाधार चक्र में नित्य स्थित हैं और तीनों शक्तियों के स्वरूप हैं।

देवस्वरूप

त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निर्वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्मभूः स्वरोमिति॥

अर्थ: योगीजन नित्य आपका ध्यान करते हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इंद्र, अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्रमा और ब्रह्मस्वरूप हैं।

बीज मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः॥

अर्थ: हे गणपति! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। यह आपका मूल बीज मंत्र है जो सभी विघ्नों को नष्ट करता है।

गायत्री मंत्र

एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम एकदंत और वक्रतुंड गणेश का ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धि को प्रेरित और प्रकाशित करें।

ध्यान श्लोक

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैरबिभ्राणं मूषकध्वजम्॥
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्॥
भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥

अर्थ: चार भुजाओं वाले, एकदंत, मूषकध्वज, लाल वस्त्रधारी, करुणामय और जगत के कारण स्वरूप भगवान गणेश का जो नित्य ध्यान करता है, वह श्रेष्ठ योगी बनता है।

समापन स्तुति

नमो व्रातपतये नमो गणपतये।
नमः प्रथमपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदन्ताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नमः॥

अर्थ: हे व्रतों के स्वामी, गणों के अधिपति, प्रथम पूज्य, लंबोदर, एकदंत, विघ्ननाशक, शिवपुत्र और वरदान देने वाले देव! आपको बार-बार प्रणाम है।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करने के लाभ:

जो भक्त श्रद्धा, विश्वास और नियमपूर्वक श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करता है, उसके जीवन से समस्त विघ्न, भय, बाधाएँ और दुःख स्वतः दूर हो जाते हैं। भगवान गणेश की कृपा से उसके कार्य निर्विघ्न पूर्ण होते हैं और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है।
इस पावन स्तोत्र के नियमित पाठ से साधक की बुद्धि तीव्र होती है, विद्या में वृद्धि होती है, आर्थिक समृद्धि प्राप्त होती है तथा कार्यक्षेत्र में सफलता के नए मार्ग खुलते हैं। यह पाठ मानसिक शांति, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति ब्रह्ममुहूर्त में या शुभ समय पर श्रद्धा से श्री गणपति अथर्वशीर्ष का जप करता है, उसके जीवन में सौभाग्य, सुख-शांति और मंगलकारी ऊर्जा का वास होता है।

1. श्री गणपति अथर्वशीर्ष क्या है?

श्री गणपति अथर्वशीर्ष एक वैदिक स्तोत्र है जिसमें भगवान गणेश को साक्षात ब्रह्म स्वरूप बताया गया है। इसका पाठ विघ्नों के नाश और बुद्धि-वृद्धि के लिए किया जाता है।

2. श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?

इसके नियमित पाठ से विघ्न, भय, रोग, बाधा और दुख दूर होते हैं तथा बुद्धि, विद्या, ऐश्वर्य, शांति और सफलता की प्राप्ति होती है।

3. क्या गणपति अथर्वशीर्ष के साथ गणेश चालीसा और स्तुति पढ़नी चाहिए?

हाँ, गणपति अथर्वशीर्ष के साथ गणेश चालीसा और गणेश स्तुति का पाठ करने से साधना अधिक फलदायी होती है और मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं।

4. गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ किस समय करना श्रेष्ठ होता है?

प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त या किसी भी शुभ समय में श्रद्धा से पाठ करना सबसे उत्तम माना गया है।

5. क्या महिलाएँ और बच्चे भी इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, महिलाएँ, बच्चे और सभी श्रद्धालु बिना किसी बाधा के श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ कर सकते हैं।

6. गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

सामान्यतः 1, 3, 5 या 11 बार पाठ किया जा सकता है। नियमित एक बार का पाठ भी अत्यंत फलदायी होता है।

7. क्या यह पाठ मनोकामना पूर्ति में सहायक है?

हाँ, श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया पाठ मनोकामना पूर्ति में सहायक माना गया है।

8. क्या इस पाठ से ग्रह दोष और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है?

शास्त्रों के अनुसार, गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ ग्रह दोष, भय, नकारात्मकता और मानसिक तनाव को दूर करने में सहायक होता है।

9. क्या बिना गुरु दीक्षा के यह पाठ किया जा सकता है?

हाँ, यह स्तोत्र सार्वजनकि है और कोई भी भक्त बिना दीक्षा के श्रद्धा से इसका पाठ कर सकता है।

10. श्री गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ किस दिन विशेष रूप से करना चाहिए?

बुधवार और गणेश चतुर्थी के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।

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