Skip to main content

Bhuvaneshwari Mata\Shri Bhuvaneshwari Trailokyamohankavacham -10121202

श्री भुवनेश्वरी त्रैलोक्यमोहनकवचम्

श्री भुवनेश्वरी त्रैलोक्यमोहनकवचम्...

भुवनेश्वरी माता - संसार भर के ऐश्वयर् की स्वामिनी आदिशक्ति दुर्गा माता के दस महाविद्याओं का पंचम स्वरूप है जिस रूप में इनहोने त्रिदेवो को दर्शन दिये थे। मां भुवनेश्वरी ही शताक्षी और शाकंभरी देवी के नाम से विख्यात हुई।
श्री भुवनेश्वरी त्रैलोक्यमोहनकवचम् का पाठ करने वाले व्यक्ति को यश, सुख, ऐश्वर्य, संपन्नता, सफलता, आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्त होता है तथा मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

॥ श्री भुवनेश्वरी त्रैलोक्यमोहनकवचम् ॥

श्री देव्युवाच-

भगवन्, परमेशान, सर्वागमविशारद।
कवचं भुवनेश्वर्याः कथयस्व महेश्वर!॥

श्री देवी ने कहा-

हे सभी आगमों के ज्ञाता भगवन् महेश्वर! भुवनेश्वरी के कवच को बताइये।

श्री भैरव उवाच-

श‍ृणु देवि, महेशानि! कवचं सर्वकामदम्।
त्रैलोक्यमोहनं नाम सर्वेप्सितफलप्रदम्॥

श्री भैरव ने कहा-

हे महेशानि! त्रैलोक्यमोहन नामक कवच सभी कामनाओं की पूर्तिं करनेवाला और सभी अभीष्ट फलों का देनेवाला है। उसे सुनो।

विनियोगः-

ॐ अस्य श्रीत्रैलोक्यमोहनकवचस्य श्रीसदाशिव ऋषिः।
विराट् छन्दः । श्रीभुवनेश्वरी देवता।
चतुर्वर्गसिद्ध्यर्थं कवचपाठे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यासः-

श्रीसदाशिवऋषये नमः शिरसि।
विराट्छन्दसे नमः मुखे।
श्रीभुवनेश्वरीदेवतायै नमः हृदि।
चतुर्वर्गसिद्ध्यर्थं कवचपाठे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे।

अथ कवचस्तोत्रम्।

ॐ ह्रीं क्लीं मे शिरः पातु श्रीं फट् पातु ललाटकम्।
सिद्धपञ्चाक्षरी पायान्नेत्रे मे भुवनेश्वरी॥ १॥

श्रीं क्लीं ह्रीं मे श्रुतीः पातु नमः पातु च नासिकाम्।
देवी षडक्षरी पातु वदनं मुण्डभूषणा॥ २॥

ॐ ह्रीं श्रीं ऐं गलं पातु जिह्वां पायान्महेश्वरी।
ऐं स्कन्धौ पातु मे देवी महात्रिभुवनेश्वरी॥ ३॥

ह्रूं घण्टां मे सदा पातु देव्येकाक्षररूपिणी।
ऐं ह्रीं श्रीं हूं तु फट् पायादीश्वरी मे भुजद्वयम्॥ ४॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं फट् पायाद् भुवनेशी स्तनद्वयम्।
ह्रां ह्रीं ऐं फट् महामाया देवी च हृदयं मम॥ ५॥

ऐं ह्रीं श्रीं हूं तु फट् पायात् पार्श्वौ कामस्वरूपिणी।
ॐ ह्रीं क्लीं ऐं नमः पायात् कुक्षिं महाषडक्षरी॥ ६॥

ऐं सौः ऐं ऐं क्लीं फट् स्वाहा कटिदेशे सदाऽवतु।
अष्टाक्षरी महाविद्या देवेशी भुवनेश्वरी॥ ७॥

ॐ ह्रीं ह्रौं ऐं श्रीं ह्रीं फट् पायान्मे गुह्यस्थलं सदा।
षडक्षरी महाविद्या साक्षाद् ब्रह्मस्वरूपिणी॥ ८॥

ऐं ह्रां ह्रौं ह्रूं नमो देव्यै देवि! सर्वं पदं ततः,
दुस्तरं पदं तारय तारय प्रणवद्वयम्।
स्वाहा इति महाविद्या जानुनि मे सदाऽवतु॥ ९॥

ऐं सौः ॐ ऐं क्लीं फट् स्वाहा जङ्घेऽव्याद् भुवनेश्वरी।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं फट् पायात् पादौ मे भुवनेश्वरी॥ १०॥

ॐ ॐ ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं क्लीं क्लीं ऐं ऐं सौः सौः वद वद।
वाग्वादिनीति च देवि विद्या या विश्वव्यापिनी॥ ११॥

सौःसौःसौः ऐंऐंऐं क्लीङ्क्लीङ्क्लीं श्रींश्रींश्रीं ह्रींह्रींह्रीं ॐ।
ॐ ॐ चतुर्दशात्मिका विद्या पायात् बाहू तु मे॥ १२॥

सकलं सर्वभीतिभ्यः शरीरं भुवनेश्वरी।
ॐ ह्रीं श्रीं इन्द्रदिग्भागे पायान्मे चापराजिता॥ १३॥

स्त्रीं ऐं ह्रीं विजया पायादिन्दुमदग्निदिक्स्थले।
ॐ श्रीं सौः क्लीं जया पातु याम्यां मां कवचान्वितम् ॥ १४॥

ह्रीं ह्रीं ऐं सौः हसौः पायान्नैरृतिर्मां तु परात्मिका।
ॐ श्रीं श्रीं ह्रीं सदा पायात् पश्चिमे ब्रह्मरूपिणी॥ १५॥

ॐ ह्रां सौः मां भयाद् रक्षेद् वायव्यां मन्त्ररूपिणी।
ऐं क्लीं श्रीं सौः सदाऽव्यान्मां कौवेर्यां नगनन्दिनी॥ १६॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महादेवी ऐशान्यां पातु नित्यशः।
ॐ ह्रीं मन्त्रमयी विद्या पायादूर्ध्वं सुरेश्वरी॥ १७॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं मां पायादधस्था भुवनेश्वरी।
एवं दशदिशो रक्षेत् सर्वमन्त्रमयो शिवा॥ १८॥

प्रभाते पातु चामुण्डा श्रीं क्लीं ऐं सौः स्वरूपिणी।
मध्याह्नेऽव्यान्मामम्बा श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः स्वरूपिणी ॥ १९॥

सायं पायादुमादेवी ऐं ह्रीं क्लीं सौः स्वरूपिणी।
निशादौ पातु रुद्राणी ॐ क्लीं क्रीं सौः स्वरूपिणी ॥ २०॥

निशीथे पातु ब्रह्माणी क्रीं ह्रूं ह्रीं ह्रीं स्वरूपिणी।
निशान्ते वैष्णवी पायादोमै ह्रीं क्लीं स्वरूपिणी ॥ २१॥

सर्वकाले च मां पायादो ह्रीं श्रीं भुवनेश्वरी।
एषा विद्या मया गुप्ता तन्त्रेभ्यश्चापि साम्प्रतम्॥ २२॥

फलश्रुतिः-

देवेशि! कथितां तुभ्यं कवचेच्छा त्वयि प्रिये।
इति ते कथितं देवि! गुह्यन्तर परं।
त्रैलोक्यमोहनं नाम कवचं मन्त्रविग्रहम्।
ब्रह्मविद्यामयं चैव केवलं ब्रह्मरूपिणम्॥ १॥

मन्त्रविद्यामयं चैव कवचं बन्मुखोदितम्।
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेद्यदि।
साधको वै यथाध्यानं तत्क्षणाद् भैरवो भवेत्।
सर्वपापविनिर्मुक्तः कुलकोटि समुद्धरेत्॥ २॥

गुरुः स्यात् सर्वविद्यासु ह्यधिकारो जपादिषु।
शतमष्टोत्तरं चास्य पुरश्चर्याविधिः स्मृता।
शतमष्टोत्तरं जप्त्वा तावद्धोमादिकं तथा।
त्रैलोक्ये विचरेद्वीरो गणनाथो यथा स्वयम्॥ ३॥

गद्यपद्यमयी वाणी भवेद् गङ्गाप्रवाहवत्।
पुष्पाञ्जल्यष्टकं दत्वा मूलेनैव पठेत् सकृत् ॥ ४॥

हे देवेशि। तुम्हारी कवचेच्छा के अनुसार यह अति गोपनीय "त्रैलोक्यमोहन" नामक मन्त्रात्मक कवच कहा गया। हे भद्रे! यह ब्रह्मविद्या से भरा हुआ है और मात्र ब्रह्मरूपात्मक है॥ १॥

मेरे मुख से निकला यह कवच मन्त्रविद्यात्मक है। गुरुदेव की पूजा कर विधिपूर्वकं इस कवच को यदि साधक ध्यानपूर्वक धारण करताहै, तो वह तत्क्षण ही सभी पापों से मुक्त होकर भैरवस्वरूप बन जाता है और करोडों कुलों का उद्धार कर देता है॥ २॥

इस कवच के प्रभाव से साधक गुरुवत् सभी विद्याओं के जप करने का अधिकारी बन जाता है। इस स्तोत्र का पुरश्चरण १०८ वार के पारायण से होता है। १०८ बार इसका जप कर उतना ही होम करें। इससे साधक तीनों लोकों में गणनाथ के समान विचरण करता है॥ ३॥

आठ पुष्पाञ्जलियां भगवती भुवनेश्वरी को अर्पित कर मूल कवच का पाठ करने से साधक की वाणी गङ्गा की धारा के समान गद्यपद्यमयी होकर धाराप्रवाह वह निकलती है॥ ४॥

|| इति श्रीभुवनेश्वरीत्रैलोक्यमोहनकवचं सम्पूर्णम् ||

Related Pages:
  1. चिन्तामणि षट्पदी स्तोत्र
  2. गणपतितालम्
  3. श्री कालभैरव अष्टकम्
  4. अंगना पधारो महारानी मोरी शारदा भवानी देवी भजन-
  5. इंद्राक्षी स्तोत्रम्
  6. श्री शिव प्रातः स्मरणस्तोत्रम्
  7. 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंग
  8. राम रक्षा स्तोत्र
  9. संकटमोचन हनुमानाष्टक
  10. Maruti Stotram in Sanskrit
  11. श्री मारुती स्तोत्र
  12. श्री बजरंग बाण
  13. चामुण्डा देवी की चालीसा
  14. Shri Ganesh Chalisa
  15. Mata Lakshmi Stotram
  16. द्वादश ज्योतिर्लिंग
  17. Maa Annapurna Stotram

Comments

Popular posts from this blog

Shri Shiv-stuti - नंदी की सवारी नाग अंगीकार धारी।

श्री शिव स्तुति | सरल और प्रभावी स्तुति का पाठ भोले शिव शंकर जी की स्तुति... ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय भगवान शिव स्तुति : भगवान भोलेनाथ भक्तों की प्रार्थना से बहुत जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसी कारण उन्हें 'आशुतोष' भी कहा जाता है। सनातन धर्म में सोमवार का दिन को भगवान शिव को समर्पित है। इसी कारण सोमवार को शिव का महाभिषेक के साथ साथ शिव की उपासना के लिए व्रत भी रखे जाते हैं। अपने परिवार के लिए सुख समृद्धि पाना के लिए सोमवार के दिन शिव स्तुति का जाप करना आपके लिए लाभकारी होगा और स्तुति का सच्चे मन से करने पर भोले भंडारी खुश होकर आशीर्वाद देते है। ॥ शिव स्तुति ॥ ॥ दोहा ॥ श्री गिरिजापति बंदि कर चरण मध्य शिर नाय। कहत गीता राधे तुम मो पर हो सहाय॥ कविता नंदी की सवारी नाग अंगीकार धारी। नित संत सुखकारी नीलकण्ठ त्रिपुरारी हैं॥ गले मुण्डमाला भारी सर सोहै जटाधारी। बाम अंग में बिहारी गिरिजा सुतवारी हैं॥ दानी बड़े भारी शेष शारदा पुकारी। काशीपति मदनारी कर शूल च्रकधारी हैं॥ कला जाकी उजियारी लख देव सो निहारी। य...

jhaankee - झांकी उमा महेश की, आठों पहर किया करूँ।

भगवान शिव की आरती | BHAKTI GYAN भगवान शिव की आरती... ॐ नमः शिवाय: | ॐ नमः शिवाय: | ॐ नमः शिवाय: | ॐ नमः शिवाय: | ॐ नमः शिवाय: भगवान शिव की पूजा के समय मन के भावों को शब्दों में व्यक्त करके भी भगवान आशुतोष को प्रसन्न किया जा सकता है। भगवान शिव की आरती से हम भगवान भोलेनाथ के चरणों में अपने स्तुति रूपी श्रद्धासुमन अर्पित कर उनका कृपा प्रसाद पा सकते हैं। ॥ झांकी ॥ झांकी उमा महेश की, आठों पहर किया करूँ। नैनो के पात्र में सुधा, भर भर के मैं पिया करूँ॥ वाराणसी का वास हो, और न कोई पास हो। गिरजापति के नाम का, सुमिरण भजन किया करूँ॥ झांकी उमा महेश की....... जयति जय महेश हे, जयति जय नन्द केश हे। जयति जय उमेश हे, प्रेम से मै जपा करूँ॥ झांकी उमा महेश की....... अम्बा कही श्रमित न हो, सेवा का भार मुझको दो। जी भर के तुम पिया करो, घोट के मैं दिया करूँ॥ झांकी उमा महेश की....... जी मै तुम्हारी है लगन, खीचते है उधर व्यसन। हरदम चलायमान हे मन, इसका उपाय क्या करूँ॥ झांकी उमा महेश की....... भिक्षा में नाथ दीजिए, सेवा में मै रहा करूँ। बेकल हु नाथ रात दिन चैन...

Sri Shiva\Rudrashtakam\Shri Rudrashtakam Stotram

श्री शिव रुद्राष्टक स्तोत्र श्री शिव रुद्राष्टक स्तोत्र... !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! भगवान शिव शंकर जी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। यदि भक्त श्रद्धा पूर्वक एक लोटा जल भी अर्पित कर दे तो भी वे प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए उन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है। 'श्री शिव रुद्राष्टकम' अपने आप में अद्भुत स्तुति है। यदि कोई आपको परेशान कर रहा है तो किसी शिव मंदिर या घर में ही कुशा के आसन पर बैठकर लगातार 7 दिनों तक सुबह शाम 'रुद्राष्टकम' स्तुति का पाठ करने से भगवान शिव बड़े से बड़े शत्रुओं का नाश करते हैं और सदैव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। रामायण के अनुसार, मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम ने रावण जैसे भयंकर शत्रु पर विजय पाने के लिए रामेशवरम में शिवलिंग की स्थापना कर रूद्राष्टकम स्तुति का श्रद्धापूर्वक पाठ किया था और परिणाम स्वरूप शिव की कृपा से रावण का अंत भी हुआ था। ॥ श्री शिव रुद्राष्टक स्तोत्र ॥ नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भज...

Mata Chamunda Devi Chalisa - नमस्कार चामुंडा माता, तीनो लोक मई मई विख्याता

चामुण्डा देवी की चालीसा | BHAKTI GYAN चामुण्डा देवी की चालीसा... हिंदू धर्म में मां दुर्गा को शक्ति स्वरूपा माना गया है। भारतवर्ष में कुल 51 शक्तिपीठ है, जिनमे से एक चामुण्‍डा देवी मंदिर शक्ति पीठ भी है। चामुण्डा देवी का मंदिर मुख्यता माता काली को समर्पित है, जो कि शक्ति और संहार की देवी है। पुराणों के अनुसार धरती पर जब कोई संकट आया है तब-तब माता ने दानवो का संहार किया है। असुर चण्ड-मुण्ड के संहार के कारण माता का नाम चामुण्डा पड़ा। श्री चामुंडा देवी मंदिर को चामुंडा नंदिकेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता है, यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले की धर्मशाला तहसील में पालमपुर शहर से 19 K.M दूर स्थित है। जो माता दुर्गा के एक रूप श्री चामुंडा देवी को समर्पित है। || चालीसा || ।। दोहा ।। नीलवरण मा कालिका रहती सदा प्रचंड, दस हाथो मई ससत्रा धार देती दुस्त को दांड्ड़ । मधु केटभ संहार कर करी धर्म की जीत, मेरी भी बढ़ा हरो हो जो कर्म पुनीत ।। ।। चौपाई ।। नमस्कार चामुंडा माता, तीनो लोक मई मई विख्याता । हिमाल्या मई पवितरा धाम है, महाशक्ति तुमको प्रडम है ।।1।। ...

Dwadash Jyotirlinga - सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। द्वादश ज्योतिर्लिंग... हिन्दू धर्म में यह माना जाता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है। श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोंकारममलेश्वरम्॥१॥ परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमाशंकरम्। सेतुबंधे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥२॥ वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यंबकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारम् घुश्मेशं च शिवालये॥३॥ एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥४॥ Related Pages: श्रीहनुमदष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् चिन्तामणि षट्पदी स्तोत्र गणपतितालम् श्री कालभैरव अष्टकम् अंगना पधारो महारानी मोरी शारदा भवानी देवी भजन- इंद्राक्षी स्तोत्रम् श्री शिव प्रातः स्मरणस्तोत्रम् 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंग राम रक्षा स्तोत्र संकटमोचन हनुमानाष्टक संस्कृत में मारुति स्तो...

Lingashtakam\Shiv\lingashtakam stotram-लिङ्गाष्टकम्

श्री लिंगाष्टकम स्तोत्र श्री शिव लिंगाष्टकम स्तोत्र... !! जय श्री सीताराम !! जय श्री हनुमान !! जय श्री दुर्गा माँ !! लिंगाष्टकम में शिवलिंग की स्तुति बहुत अद्बुध एवं सूंदर ढंग से की गयी है। सुगंध से सुशोभित, शिव लिंग बुद्धि में वृद्धि करता है। चंदन और कुमकुम के लेप से ढका होता है और मालाओं से सुशोभित होता है। इसमें उपासकों के पिछले कर्मों को नष्ट करने की शक्ति है। इसका पाठ करने वाला व्यक्ति हर समय शांति से परिपूर्ण रहता है और साधक के जन्म और पुनर्जन्म के चक्र के कारण होने वाले किसी भी दुख को भी नष्ट कर देता है। ॥ लिंगाष्टकम स्तोत्र ॥ ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् । जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥ देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम् । रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥ सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् । सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥ कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् । दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्ग...

Shiva Pratah Smaran Stotra/shiv praatah smaran stotr arth sahit

शिव प्रातः स्मरणस्तोत्रम् श्री शिव प्रातः स्मरणस्तोत्रम्... ॐ नमः शिवाय: | ॐ नमः शिवाय: | ॐ नमः शिवाय: | ॐ नमः शिवाय: | ॐ नमः शिवाय: शिव प्रातः स्मरण स्तोत्र : सुबह की जाने वाली, भगवान शिव की स्तुति, प्रातः स्मरण अर्थात सुबह किया जाने वाला ईश्वर का स्मरण है। ये एक छोटासा तीन श्लोकों का शिव स्तोत्र है, जो तीन श्लोकों की भगवान् शिव की स्तुति है। श्री शिव प्रातः स्मरणस्तोत्रम् ॥ ॐ नमः शिवाय ॥ प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं गंगाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् । खट्वांगशुलवरदाभयहस्तमीशं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥1॥ प्रातर्नमामि गिरिशं गिरिजार्धदेहं सर्गस्थितिप्रलयकारणमादिदेवम् । विश्वेश्वरं विजितविश्वमनोSभिरामं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥2॥ प्रातर्भजामि शिवमेकमनन्तमाद्यं वेदान्तवेद्यमनघं पुरुषं महान्तम् । नामादिभेदरहितं षड्भावशून्यं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥3॥ प्रातः समुत्थाय शिवं विचिन्त्य श्लोकत्रयं येSनुदिनं पठन्ति । ते दुःखजातं बहुजन्मसंचितं हित्वा पदं यान्ति तदेव शम्भो: ॥ Related Pages: 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंग रावण द्वारा रचित शिव तांडव ...